Thursday, April 2, 2015

खोज

ट्रेन चल पड़ी थी,
प्लेटफार्म ने पहले
 पीछे की ओर रेंगना शुरु किया..

फिर रफ्तार पकड़ते हुए
एक झटके से वो बिछड़ गया,
जीवन का वो पड़ाव छूट रहा था,
जहां मन ने इक्कीस साल
यायावरी के बिताए,
वो कुछ ही क्षणों में
आंखों से
ओझल हो रहा था,
और उस धुंधलाते
शहर की तस्वीरों के पीछे से

पुरानी यादें चटक हो कर
उभरती आ रही थीं
,
इक्कीस साल के इस पड़ाव में
तन कभी अकेला नहीं रहा
पुत्र, पति, पड़ोसी के रिश्तों में बंधे
बहुत से तन-मन
आसपास मंडराते रहे,
आभास ये दिलाते रहे
कि मैं अकेली नहीं हूं,
बहुत से मन मात्र तन बन कर रह गये
तो कुछ तन, मन की ओर भी बढ़े
लेकिन रिश्तों के जाले मे सब उलझते गये
लेकिन मन!
बावरा मन तो रिश्तों के इस जाल के पार
ना जाने किसे खोज रहा था

पता नहीं
जिसे मैं पाना चाहती थी,
क्या उसे मैं छोड़ आयी हूं
जो हासिल था मेरा,
क्या उसे मैं तोड़ आयी हूं
पता नहीं,
लेकिन सफर जारी है
और खोज भी.......!