Thursday, May 1, 2014

ढहना एक दरख्त का!

वो दरख्त,
दरक रहा है
जिसने बिना किसी भेदभाव के
हर परिंदे को आसरा दिया
जिसकी शाखाओं पर हर किसी के
नीड़ के लिए जगह थी
उसने हर किसी को बसेरे की जगह दिया
वो दरख्त
दरक रहा है
जिसने हर जरूरतमंद को
अपनी स्नेहिल छांव दी
जिसने हर नये बीज को
अपनी ही जमीं दी, अपनी ही खाद दी
संबल दिया
हौसला दिया
सुनहरे जीवन का नया सपना दिया

उस दरख्त ने
जीवन के सैकड़ों तूफानों
और झंझावातों के सामने भी
अपने एक भी जीवन-मूल्य को
उनके स्थान से डिगने ना दिया

दरकते दरख्त
की आंखों में एक बेबसी है,
उसके लरजते होंठ
कुछ कहने के लिए मचल रहे हैं
लेकिन आवाज ने साथ छोड़ दिया

जीवन-जड़ें आसानी से
मिट्टी नहीं छोड़ती,
उन्हीं जड़ों और जड़ों की मिट्टी के बीच
धानी रोशनी में नहाई हुई
प्राण-रस ओढ़ कर
मिट्टी को फोड़ कर
एक नयी कोंपल, ले रही थी अंगड़ाई..............

No comments:

Post a Comment