बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी.... चली भी
गयी
उपकार और साथ निभाने से शुरु हो कर...
बात...कबीर तक बह आयी..
और कबीर पर बात करते-करते एक पुरानी कहावत याद
आ गयी... और दोनों का घालमेल होने लगा... वो कहावत बाद में कहेंगे...पहले कबीर पर
एक नजर फिर से डाले...
कबीर पढ़े लिखे नहीं थे, उनके नाम पर जो
भी रचनाएं हैं.. वो उन्होंने नहीं लिखीं... बल्कि उन्होंने अपनी बातें केवल मौखिक
रूप से अपने आस-पास के लोगों के सामने रखीं... जैसा कि शैलेंद्र सर ने कहा कि कबीर
के समय चरम धार्मिक कट्टरता थी, चूंकि कबीर उस समय निम्न मानी जाने
वाली जुलाहा जाति से संबंधित थे, तो ये माना जा सकता है कि उनके सामाजिक
दायरे में भी अधिकांश इसी प्रकार की निम्न जातियों (कुछ एक अपवादों को छोड़ कर) से
रहे होंगे.... और आज हम उनकी रचनाओं के लिए उनके सामाजिक दायरे में शामिल ऐसे लोग
"अनाम" लोगों के ऋणी हैं, जिन्हें शायद कबीर की रचनाओं का इतना
मूल्य नहीं मालूम था...
कबीर का एक-एक दोहा, एक-एक
पद..कवित्त.. ऐसा है कि उस पर किताबें लिख दी जाएं...लिखीं भी गयीं हैं और आगे भी
लिखी जाएंगी... ... और कबीर साहित्य पर अगर सारी किताबों को एक साथ रख दिया जाए...
तो एक ठीक-ठाक लाइब्रेरी तो, अकेले कबीर साहित्य की ही बन जाएगी...
एक अनपढ़ आदमी होते हुए भी कबीर के अनुभव ऐसे निकले कि सदियों तक पर असर करने की
क्षमता रखते हैं..
और ये सब आज उन "अनाम" लोगों की देन
है.... जिनसे कबीर ने अपने अनुभव और विचार
... साझा किये.....
क्या होता कि अगर उन अनाम लोगों ने कबीर के उन
विचारों और अनुभवों को अगर अपने तक ही सीमित रखा होता...
क्या होता कि अगर उन अनाम लोगों ने कबीर के
विचारों का लाभ उठाने के बाद, उस लाभ को अपने तक सीमित रखा होता...
अगर कबीर के विचार उन लोगों ने एक Relay
Race की तरह हम लोगों तक नहीं पहुंचाये होते.. तो कबीर साहित्य पर
लाइब्रेरी की बात हम लोग सोंच ही नहीं सकते थे.... शायद कबीर का भी, हमारे
लिए कोई अस्तित्व नहीं होता.. जबकि कबीर थे और उनके विचार भी थे.. हां उनके विचार अव्यक्त रह जाते.. लेकिन उनके
विचार और अनुभवों का अस्तित्व वाकई रहा होता....
कबीर के समकालीन बहुत से संत कवि अनपढ़ थे, कहते हैं कि रामकृष्ण
परमहंस भी पढ़े लिखे नही थे..
हर इंसान अनपढ़ होने के बाद भी सोंचा करता है,
अनुभव
करता है.. कभी व्यक्त करता है.. कभी नहीं व्यक्त करता ... लेकिन उसने अनुभव तो
किया ही... उसने विचार तो किया ही है.... और अगर उसने अपने अनुभव और विचार किसी से
साझा नहीं किये, उसकी मृत्यु के साथ.. ही उन सभी विचारों और
अनुभवों ... का कोई अस्तित्व नहीं... यानी... एक संभावित लाइब्रेरी की मौत..
और यही कबीर चर्चा के बाद जो कहावत बार-बार
कौंध रही है...
Death of an old man is just like a burning
"Library"
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