“ज्योति! थोड़ी चीनी पीस कर रख लो, छेने में तुम जो चीनी डालती हो, उसे हम ठीक से चबा नहीं पाते हैं। चीनी का चूरा डालोगी तो अच्छा लगेगा”
अम्मा की आवाज सुन, मेरे मुहं से निकला “ठीक है अम्मा! आज हो जाएगा, मैं पीस दूंगा”
पिछले कई दिनों से ज्योति मुझसे कह रह थी कि सिल कुटवा दो, बिल्कुल चिकनी हो गयी है, ठीक से पिसाता नहीं है। मुझे लगा कि बात मेरे पर आ जाएगी, इसलिए आज समय निकाल कर खुद ही चीनी पीसने की ठान ली। नहाने के बाद किचन में जाकर सिल उठाई और ज्योति से पूछा “बट्टा कहां रखा है”
पास में ही सोफे पर बैठी अम्मा अचानक से बोल उठी “तुम्हारे यहां इसे बट्टा बोलते हैं, हमारे यहां इसे सिलौटी कहते हैं”
मैने पूछा – हमारे तुम्हारे मतलब
अम्मा – अरे मतलब, मेरे अपने घर में, तुम्हारे नाना के घर में।
नाती-पोतों का भी ब्याह देख चुकी अम्मा का मैं चेहरा देख रहा था, अपने मायके की यादें उनकी आंखों की चमक में ताजा हो रही थीं।
मैने मुस्कराते हुए कहा – अम्मा, हम सब भी तो आपही से हैं। इतनी उम्र हो गयी लेकिन ये हमारे-तुम्हारे अभी तक नहीं गया।
“घर तो हमारा वही था, और मरते वक्त तक वही रहेगा”
झुर्रियों के बीच चमकती हुई दो आंखों में अचानक से एक नन्हीं नटखट सी लड़की की चमक आ गयी थी।
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