Friday, July 10, 2015

असमंजस - एक कहानी


बेटे-बेटियों और नाती-पोतियों के बीच आज पिछहत्तरवां जन्मदिन मनाते हुए मन कुछ अजीब सा था...और ऊहापोह में था....पिछले दो दिनों से... टूटे सपनों से भरी दो उम्मीद की आंखे पीछा नहीं छोड़ रही ....... बार-बार मन में वो दो आंखे...एक अक्स का आकार ले रही थीं...
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यूनिवर्सिटी के दिनों की वो प्यारी सी लड़की.....
....जिसके साथ जिंदगी के सफर का सपना देखा था,
....जिसका केवल साथ होने पर हिमालय जैसी ऊंचाई वाले संकटों का भी सामना करने का हौसला आ जाता था
....लेकिन जीवन प्रवाह में जिसके साथ-साथ बहने की अनुमति... इसलिए नहीं मिल पायी थी कि क्योंकि अथक प्रयासों के बावजूद ... रिश्तेदारों और परिचितों के बीच सगर्व बताने लायक...आजीविका नहीं हासिल कर पाया था.. 
....जिसका अस्तित्व बहुत साल पहले इलाहाबाद की सड़कों और गलियों में छूट गया था
....जिसका चेहरा बेटे-बेटी होने के बाद धुंधला और पोते पोतियां होने तक विलुप्त हो चुका था....
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अचानक दो दिन पहले मय झुर्रियों के राजीव चौक मेट्रो स्टेशन पर सामने सजीव हो उठा था...
मैं तो शायद पहचान भी नहीं पाता..
लेकिन परिचय की पहल करने के बाद उसने कहा : टीवी पर आते रहते हो, इसलिए तुम्हें तो मैं पहचानती थी ही..और तुम्हें भूल भी कभी नहीं पायी.......वैसे बहुत ज्यादा नहीं बदले हो तुम... केवल बाल ही सफेद हुए हैं तुम्हारे.....मणि!
(ये मणि नाम उसी ने दिया था मुझे इस उम्मीद के साथ कि उसके अस्तित्व में एक मणि की तरह जड़ा जाऊंगा)
इधर उधर की बातें होने के बाद होने के बाद पता चला कि एक राजपत्रित अधिकारी के साथ उसकी शादी हो गयी थी, घर में हर तरह का पैसा बहकर आ रहा था, साथ में शराब और शबाब भी....शुरू में उसके विरोध के कुछ स्वर निकले थे, जिन्हें उसके अपने परिवार की नीची हैसियत का हवाला देकर दबा दिया जाता..
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बेटे बेटी होने के बाद... उसने अपनी जिंदगी को बच्चों के साथ ही गूंथ दिया था..... कालचक्र ने लीवर की बीमारी में पच्चीस साल पहले पति को छीन लिया...लड़के ने बालिग होने के बाद कुछ संपत्ति बेच-बाच कर कुछ कारोबार करने की कोशिश की...लेकिन संगत अच्छी ना होने की वजह से सबमें घाटा हुआ... और एक दिन मोटर-बाइक दुर्घटना में उसका भी देहांत हो गया..
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लड़की की शादी दिल्ली में हो गयी.. दामाद इंजीनियर था.. पिछले दस साल से अमेरिका में है...
ये सब जानने के बाद मैंने पूछा: तुम दिल्ली में क्या कर रही हो? 
वो: कुछ नहीं
मैं: मतलब नहीं समझा
वो: बेटे की मौत के कुछ दिनों बाद ही, तरह-तरह के रिश्तेदार आने लगे, तरह-तरह के सुझाव देने लगे, ...चाची ये कर लो, ..... बुआ ऐसा कर लो। तो उनसे छुटकारा पाने के लिए पति की बनाई सारी जमीन-जायदाद बेच दी, यहां दिल्ली में ही द्वारका में दो फ्लैट ले लिये, एक को किराये पर चढ़ा दिया है, फैमिली पेंशन और किराये से जरूरतें पूरी हो जाती हैं..
मैं: तो ये तो तुम इलाहाबाद में भी कर सकती थी
वो: बिटिया साल-दो साल में एक बार इंडिया आती है, दिल्ली में रहने पर कुछ दिन के लिए वो मेरे पास भी रहने को आ जाती है...इलाहाबाद में ही रहती तो इतना भी नहीं मिल पाती
(गहरी सांस लेते हुए) 
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................अकेलापन बहुत काटता है, मणि!
मैं: लेकिन बाकी समय क्या करती हो
मेरी आंखों में आंखें डालकर, कुछ शरारती और शोख अंदाज़ में बोली वो: 
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.....इंतज़ार!
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(अपने ही मन में मैं: 
इंतजार किसका...........मौत का या मेरा..........
मौत का इंतजार तो ना चाहते हुए भी... हर झुर्रियां करने लगती हैं
अगर अगर मेरा इंतजार कर रही हो, 
.....तो उस बुढ़िया का मैं क्या करूं, 
.....जो पिछले पैंतालीस साल से केवल मेरे चेहरे को ही पढ़ती रही है, 
.....और आज वो मेरी आंखों की पलक झपकने का भी मतलब जान लेती है
.....मेरी नजरों का सही मतलब बताने पर मुझसे ही शर्त लगा कर मुझे ही हरा देती है
....जो मेरी आदत बन चुकी है
...और 
मुझे अब जिससे प्यार है)
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- विभास

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