Saturday, March 31, 2012

सिद्धांत और व्यवहार की खाई

अर्थशास्त्र, समाज शास्त्र, राजनीति शास्त्र को भी विज्ञान कहा गया है.... सामाजिक विज्ञान....
विज्ञान
(Science)....सिद्धांतों (Theories) पर आधारित होता है...और सिद्धांत (Theory)..  मान्यताओं (assumptions) पर... मान्यताओं के कुछ प्रमुख तत्व होते हैं... और कुछ गौण तत्व..

आमतौर पर.. सिद्धांतों को अपनाने में हम लोग... प्रमुख तत्वों के आधार पर ही... उसे व्यवहार में लाने का प्रयोग करते हैं...
प्रयोगशालाओं में भौतिक शास्त्र और रसायन शास्त्र जैसे विज्ञानों के अध्ययन में.... हम उन मान्यताओं और उसके सभी कारकों (प्रमुख और गौण) को .... मान्यताओं के अनुरूप.... बना सकते हैं...
Create कर सकते हैं...

लेकिन सामाजिक विज्ञानों में अक्सर ऐसा नहीं हो पाता..... जैसे मांग और पूर्ति के सिद्धांत की मान्यताएं हैं...
- मनुष्य एक विवेकशील प्राणी है..
- वस्तु का उत्पादन स्थिर है...
- आलोच्य वस्तु का दूसरा कोई विकल्प नहीं है..

ऐसी स्थिति में जब किसी वस्तु की मांग बढ़ेगी, तो बाकी चीजें समान रहने पर.... वस्तु की कीमतें बढ़ जाएंगी...
लेकिन तब क्या होगा... अगर
- मनुष्य विवेकशील प्राणी की तरह व्यवहार ना करे
- या वस्तु का उत्पादन स्थिर ना रहे... वो और बढ़ जाए..
- या वस्तु का कोई दूसरा विकल्प आ जाए..

ऐसी स्थिति में... मांग बढ़ने पर वस्तु की कीमतें बढ़ने का सिद्धांत ... व्यवहार में खरा उतरता नहीं दिखाई देगा...

चलिए अब एक सिद्धांत और बनाते हैं...

ईमानदारी सबसे अच्छी नीति है..

और इसकी मान्यताएं हैं..
इस सिद्धांत पर चलने वाले
- व्यक्ति को जिंदगी की सफलता के बजाय सार्थकता का ध्यान रखना होगा..
- व्यक्ति को सीमित रूप से उपलब्ध संसाधनों से ही गुजारा करना होगा
- सीमित संसाधनों के बावजूद उसे अपनी अधिकतम उत्पादकता देनी होगी,
- व्यक्ति को अपने बच्चों की इच्छाओं को भी इस तरह से हैंडल करना होगा कि उनमें कोई ग्रंथि या हीन-भावना ना आये

अब इस सिद्धांत को जीवन के व्यवहार में प्रयुक्त करने पर अगर कोई एक भी मान्यता.... अधूरी रह जाती है.. या पूरी नहीं हो पाती है.... सिद्धांत और व्यवहार के बीच खाई दिखाई देगी..

और फिर आप ऐसे सिद्धांतों को लॉकर में डाल देंगे....

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