Monday, July 27, 2015

बंधन.! - एक लघु कथा

शादी की पच्चीसवीं सालगिरह पर जब बनारस ट्रांसफर होने की खुशखबरी सुनी, तो मैं बहुत खुश हुई। शादी के पांच साल बाद जब पापा रिटायर हुए थे तो उससे पहले ही उन्होंने घर बनवा लिया था। साथ पढ़ी और खेली हुई कुछ सहेलियों की भी शादी बनारस ही हुई थी। शादी जितना ही वक्त हो गया होगा, उन लोगों से मिले हुए भी। दो साल पहले बैंगलोर की एक सॉफ्टवेयर फर्म में बेटू की नौकरी लग जाने के बाद तो रोजाना का नियम सा बन गया था, मां-पापा की यादों में रहना। वैसे तो दिल्ली से बनारस अक्सर आना जाना होता रहता था, घर में छोटी बहन और भाई की शादी में भी मायके तो गयी ही थी, लेकिन मां की गोदी में सर रखकर सोने का मौका नहीं मिलता था और ना ही पापा को चिढ़ाने का कभी मौका मिला। और देवर भी बनारस ही रहते थे और इनकी भी इच्छा यही रहती थी कि देवर के यहां ही रुको। ससुराल और मायका एक ही शहर में हो जाए.... तो उसके बहुत से नुकसान भी होते हैं....लेकिन ये केवल महसूस ही किया जा सकता है...
ट्रांसफर के बाद से ही ये खुशी थी कि अब बिना किसी समारोह या उत्सव के भी मां-पापा से मिलने का, बतियाने का समय मिलेगा। और इनका भी मन था कि शिक्षा विभाग की नौकरी के बाकी बचे पांच साल यही बिताऊं और यहीं से रिटायरमेंट लें।
बहुत याद आयी थी मां की, जब बेटू तीन महीने का था और बिस्तर पर लेटे लेटे मुस्कुराते हुए हाथ-पैर हिला रहा था और मैं उसका खिलौना उठाने पीछे तक गयी थी, तो उसने सिर घुमा कर अपनी नजरों से मेरे जाने तक का पीछा किया था। क्या मैने भी ऐसा किया होगा..... और क्या सोंची होगी मां.. ये जानना चाहती थी..
बहुत याद आयी थी पापा की, जब बेटू दो तीन कदम चल कर लड़खड़ाया था और इन्होंने बेटू को संभाल लिया था। क्या पापा ने भी ऐसा किया होगा.....जानना चाहती थी मैं
बहुत याद आयी थी मां की, जब बेटू को टायफाइड हुआ था और 105 बुखार में उसके सर पर पट्टी रखते वक्त वो मां-मां बड़बड़ा रहा था... क्या मैने भी ऐसा किया होगा.....जानना चाहती थी मैं

लेकिन कभी मौका नहीं मिला.....आज अपनी इन सब यादों को फिर से जीने का मौका मिलने की खुशी थी।

ट्रांसफर के बाद चार्ज लेने जब ये आये तो जिद करके मैं भी आ गयी थी कि अकेली दिल्ली में क्या करूंगी। मकान एलॉट होने से पहले के 15-20 दिन रहे जरूर देवर के यहां थे....लेकिन इस बीच दो दिन मां के यहां रुकने का भी मौका मिला था। मां काफी कमजोर हो चुकी थीं, ऊपर से गठिया की वजह से ज्यादा हिलती डुलती भी नहीं थी। पापा के चेहरे पर भी अब चमक नहीं थीं, जब करवट लेते वक्त दर्द से मां के मुंह से कराह वाली आवाज सुनते तो.... कुछ देर उन्हें बिसूरते....फिर अखबार लेकर कमरे से बाहर निकल जाते। वर्किंग होने के बावजूद भैया-भाभी मां-पापा को पर्याप्त टाइम देते थे। पिछले सात-आठ सालों से दोनों लोग एक साथ कहीं निकले कि कम से कम एक जने तो घर में मां-पापा के साथ रहे।
दिल्ली से सामान आने और घर को सेट करने में महीना भर लग गया था। एक दिन ये आफिस के लिए तैयार हो रहे थे,
तो मैंने कहा
मैं भी तैयार हो जाती हूं, मां की तबियत ठीक नहीं है, आप मुझे कचहरी तक छोड़ देना, वहां से ऑटो मिल जाएगा।
ये
: कल भी तो गयीं थी अपने मायके.... अपने भैया से कह दो कि कोई नर्सिंग अटेंडेंट देख लें...बहुत एड आते हैं इनके फेसबुक पर... ये रोज-रोज का चक्कर मुझे पसंद नहीं......
मैं
: ......................

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