Monday, July 13, 2015

दिल्ली में बारिश

दिल्ली में इस मानूसन में केवल अभी 2-3 दिन ही पानी बरसा है.....और इस बारिश के पानी ने ही वो हाल कर दिया कि हम बारिश को ही कोसने लगे....जुमले बन गये कि
“तुमसे अपील तो थी, प्रेमिका की तरह बरसने की,
लेकिन ए मानसून, तुम बीबी की तरह टूट पड़े”
ऐसा लगता है कि जैसे हम दो-तीन दिन में ही उकता गये हों...
बचपन में हफ्तों तक बारिश की झड़ी नहीं टूटती थी, कभी झींसी, कभी फुहार और कभी झमाझम मूसलाधार... मूसलाधार बारिश तो मानो अब बस किताबी मुहावरा बन कर रह गयी है.....
आखिर क्या हो गया है... हमें जो बारिश पूरे मानसून बरस कर धरती की प्यास बुझाती है, खेतों में फसलों को लहलहाने में मदद करती है.. नदियों में नवजीवन भरती है....
उसी बारिश को लेकर हम “शहरी लोग” 3-4 दिनों में ही त्राहिमाम-त्राहिमाम करने लगते हैं, उस शहर में लगे पेड़ पौधों की भी हमें चिंता नहीं..जीव जंतुओं की भी चिंता नहीं.....अगर एक दिन हमारी गाड़ी सड़क पर निकल ना पाये या फंस जाये...तो हम चिल्लाने लगते हैं कि....
...बस कर मेघा बस कर..
किसका दोष है...... बारिश का... !
ये तो सदियों से होती आ रही है... और होती रहेगी....
फिर बेचारा बारिश का पानी जाए तो जाए कहां.... ड्रेनेज सिस्टम से तो रोजाना का काम ही नहीं संभलता... तो एक्स्ट्रा काम कैसे करे वो। बारिश के आने की सब राह तो देखते हैं.. लेकिन दो-चार दिन में कहने लगते हैं कि जाओ-जाओ...
बरसो तो आफत... ना बरसो तो कोसे जाओ..
लेकिन ये दोष बारिश का नहीं है .... ये दोष है हमारे शहरी नियोजन का... शहरों का विकास किस प्रकार हो... बारिश के पानी की क्या व्यवस्था हो... कैसे हो...
कहने को नियम बने हैं, कायदे बने हैं... कानून भी हैं..
लेकिन नीति नियंताओं के निहित स्वार्थों की टेंट में सब दम तोड़ देते हैं..
पहले के समय में शहरों में झील, तालाब, पोखर, ताल, तलैया होते थे.. संसाधनों के धनी कुछ लोग बावड़ी और कुएं भी बनवाते थे...झमाझम और मूसलाधार बारिश को भी मजा आता था... बरसने में...
आखिर उसे बहने का रास्ता और ठिकाना मिल जाता था...
लेकिन “माफिया बिल्डर” और “निहित स्वार्थों वाले नीति नियंता” ये ठिकाना खाते जा रहे हैं।
रोजगार के केंद्र के रूप में विकसित हो रहे बड़े शहरों में जल-भराव की कौन चिंता करे.....ये देखो बस कहां जमीन खाली है....
गड्ढा है .... तो उसे पाट दो... मकान बना दो
गड्ढा है .... तो उसे पाट दो.... सड़क बना दो
बारिश के दिनों में जो गड्ढे ... पानी से भरकर ताल तलैया और तालाब हो जाते थे.... वो अब इंसानों के आवासों से भरे हैं...
एक एनजीओ ने 2000 में दिल्ली के कुल 794 तालाबों का सर्वे किया था। इसके मुताबिक, ज्यादातर तालाबों पर अवैध कब्जा हो चुका था और जो तालाब थे भी, उनकी हालत खराब थी। इस बारे में एनजीओ वालों ने हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर की, जिसकी सुनवाई में तीन बार में दिल्ली सरकार ने 629 तालाबों की जानकारी दी, 2013 में दिल्ली के बाढ़ एवं सिंचाई विभाग ने जो जानकारी अदालत को दी है...
..करीब 150 तालाब तो केवल कागजों पर ही हैं..
..185 तालाबों की खुदाई की गयी..
..139 खुदाई के काबिल ही नहीं रह गये थे...
..43 गंदे पानी वाले होकर रह गयें हैं..
..89 तालाबों के विकास के लिए उन्हें दूसरे विभागों को सौंप दिया गया..
केवल
20 तालाब पहले से ही ठीक-ठाक स्थिति में थे..
ये हाल है जब बारिश के पानी के इकट्ठा होने की जगहों का ..... फिर बारिश को कोसने से क्या होगा...
फिर इन जगहों तक बारिश का पानी पहुंचाने वाले चैनलों या नालियों का... क्या हाल है....
जब दिल्ली वाले बगल वाले खाली प्लाट को भी कूड़ा घर समझते हैं...... तो सड़क और पानी के बहाव के लिए उसके किनारे बनी नालियां तो उनके बाप की ही हुईं ना...
तो दिल्ली वालों...... जलभराव आपकी नियति है..
बारिश के पानी को जितना तुम्हें कोसना है कोसो...
वो अपना रास्ता खोज लेगा और जगह भी..

Friday, July 10, 2015

असमंजस - एक कहानी


बेटे-बेटियों और नाती-पोतियों के बीच आज पिछहत्तरवां जन्मदिन मनाते हुए मन कुछ अजीब सा था...और ऊहापोह में था....पिछले दो दिनों से... टूटे सपनों से भरी दो उम्मीद की आंखे पीछा नहीं छोड़ रही ....... बार-बार मन में वो दो आंखे...एक अक्स का आकार ले रही थीं...
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यूनिवर्सिटी के दिनों की वो प्यारी सी लड़की.....
....जिसके साथ जिंदगी के सफर का सपना देखा था,
....जिसका केवल साथ होने पर हिमालय जैसी ऊंचाई वाले संकटों का भी सामना करने का हौसला आ जाता था
....लेकिन जीवन प्रवाह में जिसके साथ-साथ बहने की अनुमति... इसलिए नहीं मिल पायी थी कि क्योंकि अथक प्रयासों के बावजूद ... रिश्तेदारों और परिचितों के बीच सगर्व बताने लायक...आजीविका नहीं हासिल कर पाया था.. 
....जिसका अस्तित्व बहुत साल पहले इलाहाबाद की सड़कों और गलियों में छूट गया था
....जिसका चेहरा बेटे-बेटी होने के बाद धुंधला और पोते पोतियां होने तक विलुप्त हो चुका था....
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अचानक दो दिन पहले मय झुर्रियों के राजीव चौक मेट्रो स्टेशन पर सामने सजीव हो उठा था...
मैं तो शायद पहचान भी नहीं पाता..
लेकिन परिचय की पहल करने के बाद उसने कहा : टीवी पर आते रहते हो, इसलिए तुम्हें तो मैं पहचानती थी ही..और तुम्हें भूल भी कभी नहीं पायी.......वैसे बहुत ज्यादा नहीं बदले हो तुम... केवल बाल ही सफेद हुए हैं तुम्हारे.....मणि!
(ये मणि नाम उसी ने दिया था मुझे इस उम्मीद के साथ कि उसके अस्तित्व में एक मणि की तरह जड़ा जाऊंगा)
इधर उधर की बातें होने के बाद होने के बाद पता चला कि एक राजपत्रित अधिकारी के साथ उसकी शादी हो गयी थी, घर में हर तरह का पैसा बहकर आ रहा था, साथ में शराब और शबाब भी....शुरू में उसके विरोध के कुछ स्वर निकले थे, जिन्हें उसके अपने परिवार की नीची हैसियत का हवाला देकर दबा दिया जाता..
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बेटे बेटी होने के बाद... उसने अपनी जिंदगी को बच्चों के साथ ही गूंथ दिया था..... कालचक्र ने लीवर की बीमारी में पच्चीस साल पहले पति को छीन लिया...लड़के ने बालिग होने के बाद कुछ संपत्ति बेच-बाच कर कुछ कारोबार करने की कोशिश की...लेकिन संगत अच्छी ना होने की वजह से सबमें घाटा हुआ... और एक दिन मोटर-बाइक दुर्घटना में उसका भी देहांत हो गया..
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लड़की की शादी दिल्ली में हो गयी.. दामाद इंजीनियर था.. पिछले दस साल से अमेरिका में है...
ये सब जानने के बाद मैंने पूछा: तुम दिल्ली में क्या कर रही हो? 
वो: कुछ नहीं
मैं: मतलब नहीं समझा
वो: बेटे की मौत के कुछ दिनों बाद ही, तरह-तरह के रिश्तेदार आने लगे, तरह-तरह के सुझाव देने लगे, ...चाची ये कर लो, ..... बुआ ऐसा कर लो। तो उनसे छुटकारा पाने के लिए पति की बनाई सारी जमीन-जायदाद बेच दी, यहां दिल्ली में ही द्वारका में दो फ्लैट ले लिये, एक को किराये पर चढ़ा दिया है, फैमिली पेंशन और किराये से जरूरतें पूरी हो जाती हैं..
मैं: तो ये तो तुम इलाहाबाद में भी कर सकती थी
वो: बिटिया साल-दो साल में एक बार इंडिया आती है, दिल्ली में रहने पर कुछ दिन के लिए वो मेरे पास भी रहने को आ जाती है...इलाहाबाद में ही रहती तो इतना भी नहीं मिल पाती
(गहरी सांस लेते हुए) 
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................अकेलापन बहुत काटता है, मणि!
मैं: लेकिन बाकी समय क्या करती हो
मेरी आंखों में आंखें डालकर, कुछ शरारती और शोख अंदाज़ में बोली वो: 
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.....इंतज़ार!
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(अपने ही मन में मैं: 
इंतजार किसका...........मौत का या मेरा..........
मौत का इंतजार तो ना चाहते हुए भी... हर झुर्रियां करने लगती हैं
अगर अगर मेरा इंतजार कर रही हो, 
.....तो उस बुढ़िया का मैं क्या करूं, 
.....जो पिछले पैंतालीस साल से केवल मेरे चेहरे को ही पढ़ती रही है, 
.....और आज वो मेरी आंखों की पलक झपकने का भी मतलब जान लेती है
.....मेरी नजरों का सही मतलब बताने पर मुझसे ही शर्त लगा कर मुझे ही हरा देती है
....जो मेरी आदत बन चुकी है
...और 
मुझे अब जिससे प्यार है)
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- विभास

Wednesday, May 13, 2015

घर - एक लघु कथा


ज्योति! थोड़ी चीनी पीस कर रख लो, छेने में तुम जो चीनी डालती हो, उसे हम ठीक से चबा नहीं पाते हैं। चीनी का चूरा डालोगी तो अच्छा लगेगा

अम्मा की आवाज सुन, मेरे मुहं से निकला ठीक है अम्मा! आज हो जाएगा, मैं पीस दूंगा
पिछले कई दिनों से ज्योति मुझसे कह रह थी कि सिल कुटवा दो, बिल्कुल चिकनी हो गयी है, ठीक से पिसाता नहीं है। मुझे लगा कि बात मेरे पर आ जाएगी, इसलिए आज समय निकाल कर खुद ही चीनी पीसने की ठान ली। नहाने के बाद किचन में जाकर सिल उठाई और ज्योति से पूछा
  “बट्टा कहां रखा है

पास में ही सोफे पर बैठी अम्मा अचानक से बोल उठी
तुम्हारे यहां इसे बट्टा बोलते हैं, हमारे यहां इसे सिलौटी कहते हैं
मैने पूछा – हमारे तुम्हारे मतलब
अम्मा – अरे मतलब, मेरे अपने घर में
,  तुम्हारे नाना के घर में।
नाती-पोतों का भी ब्याह देख चुकी अम्मा का मैं चेहरा देख रहा था, अपने मायके की यादें उनकी आंखों की चमक में ताजा हो रही थीं।
मैने मुस्कराते हुए कहा – अम्मा, हम सब भी तो आपही से हैं। इतनी उम्र हो गयी लेकिन ये हमारे-तुम्हारे अभी तक नहीं गया।
घर तो हमारा वही था, और मरते वक्त तक वही रहेगा
झुर्रियों के बीच चमकती हुई दो आंखों में अचानक से एक नन्हीं नटखट सी लड़की की चमक आ गयी थी।

Wednesday, May 6, 2015

बावरा!


ये शब्द सुनते ही, मन-मस्तिष्क में कोई अर्थ या शब्दार्थ या भावार्थ नहीं
बल्कि एक जीवन जीने के एक अलमस्त तरीके की छवि दौड़ जाती है,
और
क्या मजेदार बात है कि इस छवि को,
हम कोई और शब्द नहीं दे पाते...
लेकिन ये शब्द-मात्र आनंद देता है...

आनंद....

वो आनंद जिसे शब्द देना संभव नहीं है...
आनंद को आनंद के अलावा
कोई दूसरा शब्द समझा भी नहीं सकता.
और
मैं आप सबसे भी नहीं चाहता
कि
इस पचड़े में पडें..
आनंद लें....
बावरे शब्दों का..
बावरी धुनों का..


Thursday, April 2, 2015

खोज

ट्रेन चल पड़ी थी,
प्लेटफार्म ने पहले
 पीछे की ओर रेंगना शुरु किया..

फिर रफ्तार पकड़ते हुए
एक झटके से वो बिछड़ गया,
जीवन का वो पड़ाव छूट रहा था,
जहां मन ने इक्कीस साल
यायावरी के बिताए,
वो कुछ ही क्षणों में
आंखों से
ओझल हो रहा था,
और उस धुंधलाते
शहर की तस्वीरों के पीछे से

पुरानी यादें चटक हो कर
उभरती आ रही थीं
,
इक्कीस साल के इस पड़ाव में
तन कभी अकेला नहीं रहा
पुत्र, पति, पड़ोसी के रिश्तों में बंधे
बहुत से तन-मन
आसपास मंडराते रहे,
आभास ये दिलाते रहे
कि मैं अकेली नहीं हूं,
बहुत से मन मात्र तन बन कर रह गये
तो कुछ तन, मन की ओर भी बढ़े
लेकिन रिश्तों के जाले मे सब उलझते गये
लेकिन मन!
बावरा मन तो रिश्तों के इस जाल के पार
ना जाने किसे खोज रहा था

पता नहीं
जिसे मैं पाना चाहती थी,
क्या उसे मैं छोड़ आयी हूं
जो हासिल था मेरा,
क्या उसे मैं तोड़ आयी हूं
पता नहीं,
लेकिन सफर जारी है
और खोज भी.......!

Thursday, May 1, 2014

ढहना एक दरख्त का!

वो दरख्त,
दरक रहा है
जिसने बिना किसी भेदभाव के
हर परिंदे को आसरा दिया
जिसकी शाखाओं पर हर किसी के
नीड़ के लिए जगह थी
उसने हर किसी को बसेरे की जगह दिया
वो दरख्त
दरक रहा है
जिसने हर जरूरतमंद को
अपनी स्नेहिल छांव दी
जिसने हर नये बीज को
अपनी ही जमीं दी, अपनी ही खाद दी
संबल दिया
हौसला दिया
सुनहरे जीवन का नया सपना दिया

उस दरख्त ने
जीवन के सैकड़ों तूफानों
और झंझावातों के सामने भी
अपने एक भी जीवन-मूल्य को
उनके स्थान से डिगने ना दिया

दरकते दरख्त
की आंखों में एक बेबसी है,
उसके लरजते होंठ
कुछ कहने के लिए मचल रहे हैं
लेकिन आवाज ने साथ छोड़ दिया

जीवन-जड़ें आसानी से
मिट्टी नहीं छोड़ती,
उन्हीं जड़ों और जड़ों की मिट्टी के बीच
धानी रोशनी में नहाई हुई
प्राण-रस ओढ़ कर
मिट्टी को फोड़ कर
एक नयी कोंपल, ले रही थी अंगड़ाई..............

Saturday, July 27, 2013

कबीर से अनाम तक

बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी.... चली भी गयी
उपकार और साथ निभाने से शुरु हो कर... बात...कबीर तक बह आयी..
और कबीर पर बात करते-करते एक पुरानी कहावत याद आ गयी... और दोनों का घालमेल होने लगा... वो कहावत बाद में कहेंगे...पहले कबीर पर एक नजर फिर से डाले...

कबीर पढ़े लिखे नहीं थे, उनके नाम पर जो भी रचनाएं हैं.. वो उन्होंने नहीं लिखीं... बल्कि उन्होंने अपनी बातें केवल मौखिक रूप से अपने आस-पास के लोगों के सामने रखीं... जैसा कि शैलेंद्र सर ने कहा कि कबीर के समय चरम धार्मिक कट्टरता थी, चूंकि कबीर उस समय निम्न मानी जाने वाली जुलाहा जाति से संबंधित थे, तो ये माना जा सकता है कि उनके सामाजिक दायरे में भी अधिकांश इसी प्रकार की निम्न जातियों (कुछ एक अपवादों को छोड़ कर) से रहे होंगे.... और आज हम उनकी रचनाओं के लिए उनके सामाजिक दायरे में शामिल ऐसे लोग "अनाम" लोगों के ऋणी हैं, जिन्हें शायद कबीर की रचनाओं का इतना मूल्य नहीं मालूम था...

कबीर का एक-एक दोहा, एक-एक पद..कवित्त.. ऐसा है कि उस पर किताबें लिख दी जाएं...लिखीं भी गयीं हैं और आगे भी लिखी जाएंगी... ... और कबीर साहित्य पर अगर सारी किताबों को एक साथ रख दिया जाए... तो एक ठीक-ठाक लाइब्रेरी तो, अकेले कबीर साहित्य की ही बन जाएगी... एक अनपढ़ आदमी होते हुए भी कबीर के अनुभव ऐसे निकले कि सदियों तक पर असर करने की क्षमता रखते हैं..

और ये सब आज उन "अनाम" लोगों की देन है....  जिनसे कबीर ने अपने अनुभव और विचार ... साझा किये.....
क्या होता कि अगर उन अनाम लोगों ने कबीर के उन विचारों और अनुभवों को अगर अपने तक ही सीमित रखा होता...
क्या होता कि अगर उन अनाम लोगों ने कबीर के विचारों का लाभ उठाने के बाद, उस लाभ को अपने तक सीमित रखा होता...

अगर कबीर के विचार उन लोगों ने एक Relay Race की तरह हम लोगों तक नहीं पहुंचाये होते.. तो कबीर साहित्य पर लाइब्रेरी की बात हम लोग सोंच ही नहीं सकते थे.... शायद कबीर का भी, हमारे लिए कोई अस्तित्व नहीं होता.. जबकि कबीर थे और उनके विचार भी थे..  हां उनके विचार अव्यक्त रह जाते.. लेकिन उनके विचार और अनुभवों का अस्तित्व वाकई रहा होता.... 
कबीर के समकालीन बहुत से संत कवि अनपढ़ थे, कहते हैं कि रामकृष्ण परमहंस भी पढ़े लिखे नही थे..
हर इंसान अनपढ़ होने के बाद भी सोंचा करता है, अनुभव करता है.. कभी व्यक्त करता है.. कभी नहीं व्यक्त करता ... लेकिन उसने अनुभव तो किया ही... उसने विचार तो किया ही है.... और अगर उसने अपने अनुभव और विचार किसी से साझा नहीं किये, उसकी मृत्यु के साथ.. ही उन सभी विचारों और अनुभवों ... का कोई अस्तित्व नहीं... यानी... एक संभावित लाइब्रेरी की मौत..

और यही कबीर चर्चा के बाद जो कहावत बार-बार कौंध रही है...


Death of an old man is just like a burning "Library"