Saturday, July 27, 2013

कबीर से अनाम तक

बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी.... चली भी गयी
उपकार और साथ निभाने से शुरु हो कर... बात...कबीर तक बह आयी..
और कबीर पर बात करते-करते एक पुरानी कहावत याद आ गयी... और दोनों का घालमेल होने लगा... वो कहावत बाद में कहेंगे...पहले कबीर पर एक नजर फिर से डाले...

कबीर पढ़े लिखे नहीं थे, उनके नाम पर जो भी रचनाएं हैं.. वो उन्होंने नहीं लिखीं... बल्कि उन्होंने अपनी बातें केवल मौखिक रूप से अपने आस-पास के लोगों के सामने रखीं... जैसा कि शैलेंद्र सर ने कहा कि कबीर के समय चरम धार्मिक कट्टरता थी, चूंकि कबीर उस समय निम्न मानी जाने वाली जुलाहा जाति से संबंधित थे, तो ये माना जा सकता है कि उनके सामाजिक दायरे में भी अधिकांश इसी प्रकार की निम्न जातियों (कुछ एक अपवादों को छोड़ कर) से रहे होंगे.... और आज हम उनकी रचनाओं के लिए उनके सामाजिक दायरे में शामिल ऐसे लोग "अनाम" लोगों के ऋणी हैं, जिन्हें शायद कबीर की रचनाओं का इतना मूल्य नहीं मालूम था...

कबीर का एक-एक दोहा, एक-एक पद..कवित्त.. ऐसा है कि उस पर किताबें लिख दी जाएं...लिखीं भी गयीं हैं और आगे भी लिखी जाएंगी... ... और कबीर साहित्य पर अगर सारी किताबों को एक साथ रख दिया जाए... तो एक ठीक-ठाक लाइब्रेरी तो, अकेले कबीर साहित्य की ही बन जाएगी... एक अनपढ़ आदमी होते हुए भी कबीर के अनुभव ऐसे निकले कि सदियों तक पर असर करने की क्षमता रखते हैं..

और ये सब आज उन "अनाम" लोगों की देन है....  जिनसे कबीर ने अपने अनुभव और विचार ... साझा किये.....
क्या होता कि अगर उन अनाम लोगों ने कबीर के उन विचारों और अनुभवों को अगर अपने तक ही सीमित रखा होता...
क्या होता कि अगर उन अनाम लोगों ने कबीर के विचारों का लाभ उठाने के बाद, उस लाभ को अपने तक सीमित रखा होता...

अगर कबीर के विचार उन लोगों ने एक Relay Race की तरह हम लोगों तक नहीं पहुंचाये होते.. तो कबीर साहित्य पर लाइब्रेरी की बात हम लोग सोंच ही नहीं सकते थे.... शायद कबीर का भी, हमारे लिए कोई अस्तित्व नहीं होता.. जबकि कबीर थे और उनके विचार भी थे..  हां उनके विचार अव्यक्त रह जाते.. लेकिन उनके विचार और अनुभवों का अस्तित्व वाकई रहा होता.... 
कबीर के समकालीन बहुत से संत कवि अनपढ़ थे, कहते हैं कि रामकृष्ण परमहंस भी पढ़े लिखे नही थे..
हर इंसान अनपढ़ होने के बाद भी सोंचा करता है, अनुभव करता है.. कभी व्यक्त करता है.. कभी नहीं व्यक्त करता ... लेकिन उसने अनुभव तो किया ही... उसने विचार तो किया ही है.... और अगर उसने अपने अनुभव और विचार किसी से साझा नहीं किये, उसकी मृत्यु के साथ.. ही उन सभी विचारों और अनुभवों ... का कोई अस्तित्व नहीं... यानी... एक संभावित लाइब्रेरी की मौत..

और यही कबीर चर्चा के बाद जो कहावत बार-बार कौंध रही है...


Death of an old man is just like a burning "Library"

Sunday, January 27, 2013

विविधता

ये प्रकृति, कुदरत.... विविधता की दीवानी है...
विविधता में ही इसे आनंद मिलता है..

इसीलिए... इसने अपने ही बनाये जीवों की एक प्रजाति.... डायनासोर को खत्म कर दिया... क्योंकि डायनासोरों से उसकी....
प्रकृति की.. वैविध्यपरकता को खतरा था....

कमोवेश यही चीज मनुष्य की प्रकृति के बारे में है...
 ये भी... विविधता पसंद करती है..
एक ही ... Genetic Bank से निकले इंसान... बीमारियों से लड़ने में कमजोर पाये गये हैं..
और विविध Genetic Bank से उत्पन्न मनुष्य.. ज्यादा मजबूत पाया गया है..

बच्चों के पालन पोषण में भी.. हम सब चाहते हैं...बच्चे का.. Exposure जितना विविध होगा..उसकी पर्सनैल्टी उतनी ही बढ़िया निखरेगी...

पर विचारों के मामले में हम पता नहीं क्यों संकीर्ण हो जाते हैं....

विरोध या प्रतिरोध... विविधता की जननी भी है..

जिस दिन विचारों के विरोधों और अंतर्विरोधों में निहित विविधता का आनंद उठाने की क्षमता हम में आ जाएगी.....ये दुनिया...वास्तव में दुनिया होगी.....

ये पूरी गारंटी से कह सकता हूं......

Friday, July 27, 2012

क्या लिखें....!

जीवन की धारा लिखो,
सूरज का पारा लिखो,
सूखे पत्ते का झूम कर गिरना लिखो,
नदी का वो गिरना, बन कर झरना लिखो
चींटी लिखो, जंगल लिखो
जीवन का मंगल लिखो,
अंतर्मन की अनदेखी गहराई लिखो,
सामने जो भी होता दिखाई लिखो


एक बरगद हो रहा धराशाई लिखो
एक कोंपल की पहली अंगड़ाई लिखो,



शंकर का विषपान लिखो,
कान्हा के रसखान लिखो,
लिखो ऐसा कि अंधेरे के मन में डर समा जाए.
लिखो ऐसा कि इंसां नयी रोशनी में नहा जाए.

Saturday, March 31, 2012

सिद्धांत और व्यवहार की खाई

अर्थशास्त्र, समाज शास्त्र, राजनीति शास्त्र को भी विज्ञान कहा गया है.... सामाजिक विज्ञान....
विज्ञान
(Science)....सिद्धांतों (Theories) पर आधारित होता है...और सिद्धांत (Theory)..  मान्यताओं (assumptions) पर... मान्यताओं के कुछ प्रमुख तत्व होते हैं... और कुछ गौण तत्व..

आमतौर पर.. सिद्धांतों को अपनाने में हम लोग... प्रमुख तत्वों के आधार पर ही... उसे व्यवहार में लाने का प्रयोग करते हैं...
प्रयोगशालाओं में भौतिक शास्त्र और रसायन शास्त्र जैसे विज्ञानों के अध्ययन में.... हम उन मान्यताओं और उसके सभी कारकों (प्रमुख और गौण) को .... मान्यताओं के अनुरूप.... बना सकते हैं...
Create कर सकते हैं...

लेकिन सामाजिक विज्ञानों में अक्सर ऐसा नहीं हो पाता..... जैसे मांग और पूर्ति के सिद्धांत की मान्यताएं हैं...
- मनुष्य एक विवेकशील प्राणी है..
- वस्तु का उत्पादन स्थिर है...
- आलोच्य वस्तु का दूसरा कोई विकल्प नहीं है..

ऐसी स्थिति में जब किसी वस्तु की मांग बढ़ेगी, तो बाकी चीजें समान रहने पर.... वस्तु की कीमतें बढ़ जाएंगी...
लेकिन तब क्या होगा... अगर
- मनुष्य विवेकशील प्राणी की तरह व्यवहार ना करे
- या वस्तु का उत्पादन स्थिर ना रहे... वो और बढ़ जाए..
- या वस्तु का कोई दूसरा विकल्प आ जाए..

ऐसी स्थिति में... मांग बढ़ने पर वस्तु की कीमतें बढ़ने का सिद्धांत ... व्यवहार में खरा उतरता नहीं दिखाई देगा...

चलिए अब एक सिद्धांत और बनाते हैं...

ईमानदारी सबसे अच्छी नीति है..

और इसकी मान्यताएं हैं..
इस सिद्धांत पर चलने वाले
- व्यक्ति को जिंदगी की सफलता के बजाय सार्थकता का ध्यान रखना होगा..
- व्यक्ति को सीमित रूप से उपलब्ध संसाधनों से ही गुजारा करना होगा
- सीमित संसाधनों के बावजूद उसे अपनी अधिकतम उत्पादकता देनी होगी,
- व्यक्ति को अपने बच्चों की इच्छाओं को भी इस तरह से हैंडल करना होगा कि उनमें कोई ग्रंथि या हीन-भावना ना आये

अब इस सिद्धांत को जीवन के व्यवहार में प्रयुक्त करने पर अगर कोई एक भी मान्यता.... अधूरी रह जाती है.. या पूरी नहीं हो पाती है.... सिद्धांत और व्यवहार के बीच खाई दिखाई देगी..

और फिर आप ऐसे सिद्धांतों को लॉकर में डाल देंगे....

Friday, January 27, 2012

बरगद...



बड़ा निर्मोही और निष्ठुर होता है.. बरगद

तमाम छोटी - बड़ी जिंदगियों को कभी 
आसरा देने से पीछे नहीं हटता 
लेकिन उन जिंदगियों को 
उनके नये सफर की उड़ान भरने से 
कभी नहीं रोकता
बड़ा निर्मोही और निष्ठुर होता है.. बरगद

तमाम पथिकों को 
अपनी विशाल छांह में विश्राम देता है
उनकी जिंदगी की कशमकश से निकले
स्वेद बिंदुओं को,
अपने प्यार के आंचल से पोंछता है, 
फिर भूल जाता है उन पथिकों को
बड़ा निर्मोही और निष्ठुर होता है.. बरगद

तूफां को भी अपनी जटाओं में
उलझा ले, 
लेकिन अपनी छांव में किसी को 
पनपने नहीं देता,
अपनों को आंसुओं के साथ विदा 
करने को लाचार औ बेबस होता है.. बरगद,
बड़ा निर्मोही और निष्ठुर होता है.. बरगद