Wednesday, May 13, 2015

घर - एक लघु कथा


ज्योति! थोड़ी चीनी पीस कर रख लो, छेने में तुम जो चीनी डालती हो, उसे हम ठीक से चबा नहीं पाते हैं। चीनी का चूरा डालोगी तो अच्छा लगेगा

अम्मा की आवाज सुन, मेरे मुहं से निकला ठीक है अम्मा! आज हो जाएगा, मैं पीस दूंगा
पिछले कई दिनों से ज्योति मुझसे कह रह थी कि सिल कुटवा दो, बिल्कुल चिकनी हो गयी है, ठीक से पिसाता नहीं है। मुझे लगा कि बात मेरे पर आ जाएगी, इसलिए आज समय निकाल कर खुद ही चीनी पीसने की ठान ली। नहाने के बाद किचन में जाकर सिल उठाई और ज्योति से पूछा
  “बट्टा कहां रखा है

पास में ही सोफे पर बैठी अम्मा अचानक से बोल उठी
तुम्हारे यहां इसे बट्टा बोलते हैं, हमारे यहां इसे सिलौटी कहते हैं
मैने पूछा – हमारे तुम्हारे मतलब
अम्मा – अरे मतलब, मेरे अपने घर में
,  तुम्हारे नाना के घर में।
नाती-पोतों का भी ब्याह देख चुकी अम्मा का मैं चेहरा देख रहा था, अपने मायके की यादें उनकी आंखों की चमक में ताजा हो रही थीं।
मैने मुस्कराते हुए कहा – अम्मा, हम सब भी तो आपही से हैं। इतनी उम्र हो गयी लेकिन ये हमारे-तुम्हारे अभी तक नहीं गया।
घर तो हमारा वही था, और मरते वक्त तक वही रहेगा
झुर्रियों के बीच चमकती हुई दो आंखों में अचानक से एक नन्हीं नटखट सी लड़की की चमक आ गयी थी।

Wednesday, May 6, 2015

बावरा!


ये शब्द सुनते ही, मन-मस्तिष्क में कोई अर्थ या शब्दार्थ या भावार्थ नहीं
बल्कि एक जीवन जीने के एक अलमस्त तरीके की छवि दौड़ जाती है,
और
क्या मजेदार बात है कि इस छवि को,
हम कोई और शब्द नहीं दे पाते...
लेकिन ये शब्द-मात्र आनंद देता है...

आनंद....

वो आनंद जिसे शब्द देना संभव नहीं है...
आनंद को आनंद के अलावा
कोई दूसरा शब्द समझा भी नहीं सकता.
और
मैं आप सबसे भी नहीं चाहता
कि
इस पचड़े में पडें..
आनंद लें....
बावरे शब्दों का..
बावरी धुनों का..


Thursday, April 2, 2015

खोज

ट्रेन चल पड़ी थी,
प्लेटफार्म ने पहले
 पीछे की ओर रेंगना शुरु किया..

फिर रफ्तार पकड़ते हुए
एक झटके से वो बिछड़ गया,
जीवन का वो पड़ाव छूट रहा था,
जहां मन ने इक्कीस साल
यायावरी के बिताए,
वो कुछ ही क्षणों में
आंखों से
ओझल हो रहा था,
और उस धुंधलाते
शहर की तस्वीरों के पीछे से

पुरानी यादें चटक हो कर
उभरती आ रही थीं
,
इक्कीस साल के इस पड़ाव में
तन कभी अकेला नहीं रहा
पुत्र, पति, पड़ोसी के रिश्तों में बंधे
बहुत से तन-मन
आसपास मंडराते रहे,
आभास ये दिलाते रहे
कि मैं अकेली नहीं हूं,
बहुत से मन मात्र तन बन कर रह गये
तो कुछ तन, मन की ओर भी बढ़े
लेकिन रिश्तों के जाले मे सब उलझते गये
लेकिन मन!
बावरा मन तो रिश्तों के इस जाल के पार
ना जाने किसे खोज रहा था

पता नहीं
जिसे मैं पाना चाहती थी,
क्या उसे मैं छोड़ आयी हूं
जो हासिल था मेरा,
क्या उसे मैं तोड़ आयी हूं
पता नहीं,
लेकिन सफर जारी है
और खोज भी.......!

Thursday, May 1, 2014

ढहना एक दरख्त का!

वो दरख्त,
दरक रहा है
जिसने बिना किसी भेदभाव के
हर परिंदे को आसरा दिया
जिसकी शाखाओं पर हर किसी के
नीड़ के लिए जगह थी
उसने हर किसी को बसेरे की जगह दिया
वो दरख्त
दरक रहा है
जिसने हर जरूरतमंद को
अपनी स्नेहिल छांव दी
जिसने हर नये बीज को
अपनी ही जमीं दी, अपनी ही खाद दी
संबल दिया
हौसला दिया
सुनहरे जीवन का नया सपना दिया

उस दरख्त ने
जीवन के सैकड़ों तूफानों
और झंझावातों के सामने भी
अपने एक भी जीवन-मूल्य को
उनके स्थान से डिगने ना दिया

दरकते दरख्त
की आंखों में एक बेबसी है,
उसके लरजते होंठ
कुछ कहने के लिए मचल रहे हैं
लेकिन आवाज ने साथ छोड़ दिया

जीवन-जड़ें आसानी से
मिट्टी नहीं छोड़ती,
उन्हीं जड़ों और जड़ों की मिट्टी के बीच
धानी रोशनी में नहाई हुई
प्राण-रस ओढ़ कर
मिट्टी को फोड़ कर
एक नयी कोंपल, ले रही थी अंगड़ाई..............

Saturday, July 27, 2013

कबीर से अनाम तक

बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी.... चली भी गयी
उपकार और साथ निभाने से शुरु हो कर... बात...कबीर तक बह आयी..
और कबीर पर बात करते-करते एक पुरानी कहावत याद आ गयी... और दोनों का घालमेल होने लगा... वो कहावत बाद में कहेंगे...पहले कबीर पर एक नजर फिर से डाले...

कबीर पढ़े लिखे नहीं थे, उनके नाम पर जो भी रचनाएं हैं.. वो उन्होंने नहीं लिखीं... बल्कि उन्होंने अपनी बातें केवल मौखिक रूप से अपने आस-पास के लोगों के सामने रखीं... जैसा कि शैलेंद्र सर ने कहा कि कबीर के समय चरम धार्मिक कट्टरता थी, चूंकि कबीर उस समय निम्न मानी जाने वाली जुलाहा जाति से संबंधित थे, तो ये माना जा सकता है कि उनके सामाजिक दायरे में भी अधिकांश इसी प्रकार की निम्न जातियों (कुछ एक अपवादों को छोड़ कर) से रहे होंगे.... और आज हम उनकी रचनाओं के लिए उनके सामाजिक दायरे में शामिल ऐसे लोग "अनाम" लोगों के ऋणी हैं, जिन्हें शायद कबीर की रचनाओं का इतना मूल्य नहीं मालूम था...

कबीर का एक-एक दोहा, एक-एक पद..कवित्त.. ऐसा है कि उस पर किताबें लिख दी जाएं...लिखीं भी गयीं हैं और आगे भी लिखी जाएंगी... ... और कबीर साहित्य पर अगर सारी किताबों को एक साथ रख दिया जाए... तो एक ठीक-ठाक लाइब्रेरी तो, अकेले कबीर साहित्य की ही बन जाएगी... एक अनपढ़ आदमी होते हुए भी कबीर के अनुभव ऐसे निकले कि सदियों तक पर असर करने की क्षमता रखते हैं..

और ये सब आज उन "अनाम" लोगों की देन है....  जिनसे कबीर ने अपने अनुभव और विचार ... साझा किये.....
क्या होता कि अगर उन अनाम लोगों ने कबीर के उन विचारों और अनुभवों को अगर अपने तक ही सीमित रखा होता...
क्या होता कि अगर उन अनाम लोगों ने कबीर के विचारों का लाभ उठाने के बाद, उस लाभ को अपने तक सीमित रखा होता...

अगर कबीर के विचार उन लोगों ने एक Relay Race की तरह हम लोगों तक नहीं पहुंचाये होते.. तो कबीर साहित्य पर लाइब्रेरी की बात हम लोग सोंच ही नहीं सकते थे.... शायद कबीर का भी, हमारे लिए कोई अस्तित्व नहीं होता.. जबकि कबीर थे और उनके विचार भी थे..  हां उनके विचार अव्यक्त रह जाते.. लेकिन उनके विचार और अनुभवों का अस्तित्व वाकई रहा होता.... 
कबीर के समकालीन बहुत से संत कवि अनपढ़ थे, कहते हैं कि रामकृष्ण परमहंस भी पढ़े लिखे नही थे..
हर इंसान अनपढ़ होने के बाद भी सोंचा करता है, अनुभव करता है.. कभी व्यक्त करता है.. कभी नहीं व्यक्त करता ... लेकिन उसने अनुभव तो किया ही... उसने विचार तो किया ही है.... और अगर उसने अपने अनुभव और विचार किसी से साझा नहीं किये, उसकी मृत्यु के साथ.. ही उन सभी विचारों और अनुभवों ... का कोई अस्तित्व नहीं... यानी... एक संभावित लाइब्रेरी की मौत..

और यही कबीर चर्चा के बाद जो कहावत बार-बार कौंध रही है...


Death of an old man is just like a burning "Library"

Sunday, January 27, 2013

विविधता

ये प्रकृति, कुदरत.... विविधता की दीवानी है...
विविधता में ही इसे आनंद मिलता है..

इसीलिए... इसने अपने ही बनाये जीवों की एक प्रजाति.... डायनासोर को खत्म कर दिया... क्योंकि डायनासोरों से उसकी....
प्रकृति की.. वैविध्यपरकता को खतरा था....

कमोवेश यही चीज मनुष्य की प्रकृति के बारे में है...
 ये भी... विविधता पसंद करती है..
एक ही ... Genetic Bank से निकले इंसान... बीमारियों से लड़ने में कमजोर पाये गये हैं..
और विविध Genetic Bank से उत्पन्न मनुष्य.. ज्यादा मजबूत पाया गया है..

बच्चों के पालन पोषण में भी.. हम सब चाहते हैं...बच्चे का.. Exposure जितना विविध होगा..उसकी पर्सनैल्टी उतनी ही बढ़िया निखरेगी...

पर विचारों के मामले में हम पता नहीं क्यों संकीर्ण हो जाते हैं....

विरोध या प्रतिरोध... विविधता की जननी भी है..

जिस दिन विचारों के विरोधों और अंतर्विरोधों में निहित विविधता का आनंद उठाने की क्षमता हम में आ जाएगी.....ये दुनिया...वास्तव में दुनिया होगी.....

ये पूरी गारंटी से कह सकता हूं......

Friday, July 27, 2012

क्या लिखें....!

जीवन की धारा लिखो,
सूरज का पारा लिखो,
सूखे पत्ते का झूम कर गिरना लिखो,
नदी का वो गिरना, बन कर झरना लिखो
चींटी लिखो, जंगल लिखो
जीवन का मंगल लिखो,
अंतर्मन की अनदेखी गहराई लिखो,
सामने जो भी होता दिखाई लिखो


एक बरगद हो रहा धराशाई लिखो
एक कोंपल की पहली अंगड़ाई लिखो,



शंकर का विषपान लिखो,
कान्हा के रसखान लिखो,
लिखो ऐसा कि अंधेरे के मन में डर समा जाए.
लिखो ऐसा कि इंसां नयी रोशनी में नहा जाए.